Sunday, 30 December 2012

कहाँ तक गिरेगे



यह जिन्दगी भी क्या जिन्दगी 
इज्ज़त तो है पर पानी पानी है,

आज के खुले  दोर मे 
ये शर्म-हया कोरी बेमानी है।

आज ज़िंदा होकर भी मुर्दा हो  ,
और कहते हो यह तो नादानी है?

तुम्हे अपनी सभ्येता से क्या लेना- देना 
तू तो कल की जन्मी सभ्येता की दीवानी है    



किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ यहाँ।
फिर  चाहे  वो कोई बारात हो या वारदात 


यहाँ की  हवाओं में भी दर्द और पीड़ा है,
लगता है की पराई धरती, अंजान देश?




एक खँडहर की भांति है मेरी संस्क्रती  
अब आदमी जंगली और मेरा आंगन जंगल 



3 comments:

Rajput said...

मौजूदा हालात के मद्देनजर खूबसूरत रचना

Ratan singh shekhawat said...

वर्तमान हालात तो ऐसे ही नजर आ रहें है|

Rohitas ghorela said...

तुम्हे अपनी सभ्येता से क्या लेना- देना
तू तो कल की जन्मी सभ्येता की दीवानी है.

आय-हाय कितनी गहरी बात कह डाली आपने ...

यहाँ पर आपका इंतजार रहेगा शहरे-हवस

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