Wednesday, 18 July 2012

मेरा जुर्म

      



     मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?
      कोई भी नहीं सुनेगा मेरी चीख-पुकार,

      कोई नहीं बढ़ाएगा अपना हाथ मेरी  तरफ,
      मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?

      उनको सुख फूलों के और हमें दर्द के कांटे.
     मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?

    जन्मते ही तुम तो कर देते हो पराई,
    मैने बेटी बन जन्म लीया,........

    मै तो कोरा सा एक पन्ना जिस् पर पल मे धूल नजर आये,
    मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?

    मे माँ भी हु बहिन भी हु और आगे जाकर पत्नी भी,
    मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?

    अपने लिए तो जीना सिखाया ही नहीं माँ ने.......
    मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?

   मुझे देवी की उपमा दे दी ताकि अपने उत्पीडन का विरोध ना करू ..... 
   मैने बेटी बन जन्म लीया, यह मेरा जुर्म...?


   तुम तो वही कर रहे हो जो पहले से करते आ रहे हो ...
  पर मे बदलाव लाने की कोशिश मे अपना वजूद खो रही हु  

          
             "बस मेरा कसूर यही है की मैने बेटी बन जन्म लीया"

                           छायाचित्र युवा नागौर 

3 comments:

Malpani said...

dil ko choo gayee

sunita gour said...

शब्द गर खामोश होते...




शब्द गर खामोश होते होठ भी न फड़फड़ाते !
नैन की भाषा समझकर, मन ही मन यूँ मुस्कुराते.
शब्द गर जो गलत होते, यत्र तत्र हम होश खोते.
शब्द गर जो निकल गए तो, कभी नहीं वापस वे होते.
शब्द कर्कश मुख है तरकश, स्वयं सुसज्जित दीखते है,
निकल जाएँ, छूट जाएँ, घाव बन कर टीसते हैं.
असि से गर ये घाव बनते, मसि उनको साधते हैं.
निकल बाहर आ गए तो, जिस किसी को काटते हैं.
मूक बनकर पशु को देखो, क्या नहीं बतला वे जाते?
पुष्प द्रुमदल वाटिका के, देखकर ही मुस्कुराते.
मनुज की पीड़ा बड़ी है, विपद की आई घड़ी है
चुप नहीं हम रह ही पाते, बेवजह कुछ बोल जाते
शब्द के तीरों से घायल, स्वजन ही अघात पाते.
द्रौपदी के शब्द से आहत हुआ था दुर्योधन
द्युत क्रीडा जीत किया, द्रौपदी का मान मर्दन!
द्रौपदी चीखी पुकारी, कृष्ण ने इज्जत बचाई.
भीम की प्रतिज्ञा से, भार्त्रिद्वय ने सजा पायी.
मौन जी ने मौन रहकर, आबरू सबकी बचाई.
अब सहो सब देश खातिर, मत करो अब तो लड़ाई!
मौन रहकर देख, अन्ना ने है अब आंसू बहाया !
मौन ही धृतराष्ट्र रह के,शत सभी सुत को गंवाया !!
आम जन सब मौन ही है, हर समस्या गौण ही है
मौन के मारे सभी हैं, पादुका मारे कभी हैं.
नितीश बाबु की सभा में, शिक्षकों की ही कमी है!
ओ मेरे मन तू बहल जा, गम के मारे ही सभी हैं!
ओ मेरे मन तू बहल जा, गम के मारे ही सभी हैं!

Rajput said...

bahut khubsurat rachna

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