Saturday, 31 December 2011

समय


समय अमूल्य है । जिंदगी में एक वर्ष का क्या महत्त्व है ? यह इसी वर्ष फेल हुये विद्यार्थी से पूछिये । एक माह का महत्त्व जानना हो तो उस माँ से पूछिये जिसने अठ-मासिया बच्चे को जन्म दिया है । सात दिन का महत्त्व जानने के लिये किसी साप्ताहिक पत्र के सम्पादक से मिलिये । एक दिन का महत्त्व वह दिहाडी मजदूर बता सकता है जिसे आज मजदूरी नहीं मिली है । एक घंटे का महत्त्वजानना है तो सिकन्दर से पूछिये जिसने आधा राज...्य देकर एक घंटे मौत को टालने का आग्रह किया था । एक मिनिट का महत्त्व उस भाग्यशाली से पूछिये जो वर्ल्ड-ट्रेड सेन्टर की इमारत गिरने से ठीक एक मिनिट पहले ही बाहर सुरक्षित निकला था । अब बचा एक सैकंड। तो एक सैकंड का महत्त्व उस धावक से पूछिये जो इसी एक सैकंड की वजह से स्वर्ण पदक पाते पाते रजतपदक पर रह गया हैनव वर्ष आप सभी के लिए नई चेतना , ऊर्जा , जोश , लाभ , प्रगति व उन्नति लेकर आये ! इसी आशा के साथ आप का अपना गजेन्द्र सिंह रायधना ...


Friday, 30 December 2011

मेरा फ़र्ज़

एक बहुत बड़ा पेड़ था जिसपर हज़ारों पक्षी रोज़ अपना बसेरा करते थे. किसी दिन उस पेड़ में आग लग गयी…तथापि पक्षियों ने उसी पेड़ पर रहते हुए जल मरने का निर्णय लिय…. कवि यह सब देख रहा है …. पक्षियों से पूछता है–आग लगी इस वृक्ष में जरन लगे सब पात
तुम पंछी क्यों जरत हौ…. जब पंख तुम्हारे पास
जलते जलते पक्षियों ने अपनी भावनाओं को कुछ इस तरह से व्यक्त किया -
फल खाए इस वृक्ष के गंदे कीन्हें पात….
अब फ़र्ज़ हमारा यही है कि जले इसी के साथ
भारत वर्ष कभी बलिदानियों और वीरों से खाली नहीं रहा है… सुख समृद्धि और आज़ादी ने हमारी प्राथमिकताएं बदल दी हैं. हम राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भूल जाते हैं. विदेशी आक्रान्ताओं और अपने घर के भेदियों से इस देश का सीना बार बार छलनी किया गया. इसकी अस्मिता पर बार बार दाग लगाने की कोशिश की गयी किन्तु भारत सदैव अक्षुण्ण रहा –


****** जय हिंद *******

Sunday, 18 December 2011

मेरा गावं :- रायधना

गावं मे स्थित गोगामेडी 
 रायधना इसे आज कल नया नाम मिल गया है राइ का बाग़ ! नाम के अनुरूप यहाँ पर कुछ भी नहीं है ! आज के युग से कई साल पीछे चल रहा है !
मेरा गावं नागौर जिले की सीमा पर है यह मान लीजिये की आखरी गावं है ! इसके बुरब   दिशा मे  सीकर जिले की सीमा लग जाती है और उतर दिशा मे चुरू जिले की सीमा  आ जाती  है! यह गावं नागौर से अलग थलग पड़ता है इस कारण इस गावं का विकास होने का तो सवाल ही नहीं है! लगभग लोग जानते ही नहीं है इस गावं को ! यहाँ से नागौर की दुरी ८५ किलोमीटर है ! यातायात की बात करे तो यहाँ पर राजस्थान राज्य पथ परिवन निगम की कोई बस सेवा नहीं है! एक या दो निजी बस चलती है ! यहाँ पर पेयजल के लिए सीकर जिले के नेछ्वा कस्बे से पानी आता है वो भी फोलोरिड युक्त ! स्कूल के नाम पर यहाँ पर परामरी स्कूल है उसमे भी ५ से १० छात्र है अभी एक बालिका विधालय भी बना है उसका भी यही हाल है यहाँ के बच्चे आज भी  कोठारी  स्कूल या फिर कोई निजी संस्थान मे पढने जाते है रोज़ १० किलोमीटर पैदल जाते है ! अब चिकित्सा की बात कर लेते है! यहाँ पर सम्दायक सवास्थ्य केंद्र तो है पर वहा पर आज तक मुझे तो कोई कर्मचारी दिखाई  नहीं दिया आज भी लोग समीप के कस्बे गनेडी ही जाते है वैध जी के पास या फिर सीकर जाते है नागौर और लाडनू तो जा ही नहीं सकते वहा के लिए साधन ही नहीं है! बस तो चलती नहीं है !  इस गावं ने  सेना में चाहे  वो थल सेना हो या फिर जल सेना तीनो सेनाओं मे निरंतर सेवा दी है ! यहाँ के लोग हर विभाग मे सेवा देते आ रहे है !  इस गावं का आज पिछड़े  का सबसे बड़ा कारण राजनीती  पिछड़ापन है!
यहाँ पर नेता जी सिर्फ चुनाव के टाइम पर ही आते  है बाद मे वो ५ साल तक इस गावं के लिए  अंतर्धान हो जाते है !  यह मेरे निजी विचार है!

Monday, 28 November 2011

-:बेटी की पुकार :-



यह कविता आज की बेटी की पुकार है ! वो अपनी माँ को कोसती है की मुझे इस समाज मे जन्म दे कर बहुत बड़ी गलती की है !


मैने बेटी बन जन्म लीया,


मोहे क्यों जन्म दीया मेरी माँ


जब तू ही अधूरी सी थी!


तो क्यों अधूरी सी एक आह को जन्म दीया,


मै कांच की एक मूरत जो पल भर मै टूट जाये,


मै साफ सा एक पन्ना जिस् पर पल मे धूल नजर आये,


क्यों ऐसे जग मै जनम दीया, मोहे क्यों जनम दीया मेरी माँ,


क्यों उंगली उठे मेरी तरफ ही, क्यों लोग ताने मुझे ही दे


मै जित्ना आगे बढ़ना चाहू क्यों लोग मुझे पिछे खीचे!


क्यों ताने मे सुनती हू माँ,मोहे क्यों जन्म दीया मेरी माँ?

Thursday, 24 November 2011

राजस्थानी विहर गीत


राजस्थानी विहर गीत :- राजस्थान के लोग पुराने ज़माने में व्यापार करने के लिए देश के  दुसरे राज्यों मे जाते थे ! तब उनकी पत्नी  विहर गीत गाती थी ! कभी कारुज़ा को बोलती की की मेरे पिया को संदेसा भिजवाती ! कुछ ऐसा यह गीत है जो अपने पिया को बोलती है की आप परदेश मत जावो
ओजी ओ हदक मिजाजो ओ ढोला
ओजी ओ हदक मिजाजी ओ ढोला
मतना सिधाऔ पूरबियै परदेस
रैवो नै अमीणै देस |
पूरबियै मैं तपै रै तावड़ौ, लूवां लाय लगाय
घूंघट री छांयां कुण करसी, कुण थांनै चँवर डुळाय
ओजी मिरगानैणी रा ढोला, मतना सिधाओ
पूरबियै परदेस, रैवो नै अमीणै देस |
पूरबियै मैं डांफर बाजै, ठंड पड़ै असराळ
सेज बिछा कुण अंग लगासी, पिलँग पथरणौ ढाळ
ओजी पिया प्यारी रा ढोला, मतना सिधाऔ
पूरबियै परदेस, रैवो नै अमीणै देस |
पूरबियै मैं बसै नखराळी, कांमणगारी नार
कांमण करसी मन बिलमासी, झांझर रै झिंणकार
ओजी चन्नावरणी रा ढोला, मतना सिधाऔ
पूरबियै परदेस, रैवो नै अमीणै देस |
चैत महीनै रुप निखरतां, क्यूं छोडौ घरबार
च्यार टकां की थारी नोकरी, लाख टकां की नार
ओजी नणदलबाई रा ओ वीरा, मतना सिधाऔ


पूरबियै परदेस, रैवो नै अमीणै देस |

Tuesday, 30 August 2011

बाबा रामदेव का मेला

बाबा रामदेव 
रामदेवरा में प्रतिवर्ष भादवा सुदी दूज से भादवा सुदी एकादशी तक एक विशाल मेला भरता हैं. यह मेला दूज को मंगला आरती के साथ ही शुरू होता हैं. सांप्रदायिक सदभाव के प्रतीक इस मेले में शामिल होने व मन्नतें मांगने के लिए राजस्थान ही नहीं गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा,मध्यप्रदेश व अन्य राज्यों से भी लाखों की तादाद में श्रद्धालुजन पहुंचते है. कोई पैदल तो कोई यातायात के वाहनों के माध्यम से रामदेवरा पहुंचता है. रुणिचा पहुंचते ही वहा की छठा अनुपम लगती है. मेले के दिनों में "रुणिचा" नई नगरी बन जाता हैं. मेले के अवसर पर जम्में जागरण आयोजित होते हैं तथा भंडारों की भी व्यवस्था होती हैं. इस मेले के अतिरिक्त माघ माह में भी मेला भरता हैं. उसे "माघ मेला" कहा जाता है. जो लोग भादवा मेले की भयंकर भीड़ से ऊब जाते हैं वे "माघ मेले" में अवश्य शामिल होते है तथा मंदिर में श्रद्धाभिभुत होकर धोक लगाते है.
जम्मा जागरण :
जम्मा जागरण रामदेवजी की लीला का बखान करने का सबसे पुराना स्रोत हैं. पुराने समय में बाबा का यशोगान हरजी भाटी }kjk भजनों के माध्यम से किया जाता था. बाबा के जम्मे में रात भर भजनों की गंगा बहती हैं साथ ही गुग्गल धूप एवं अखंड ज्योत भी रात भर प्रज्ज्वलित रहते हैं | रामदेवरा में प्रतिमाह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मंदिर के आगे ही जम्मे का आयोजन होता हैं. जम्मे की सम्पूर्ण व्यवस्था यहाँ के स्थानीय नागरिकों   }kjk की जाती हैं. रात 9 बजे मंदिर के पट्ट बंद होने के बाद से ही यहाँ पर जम्मा शुरू हो जाता हैं जो कि अल सुबह तक चलता हैं. जम्मे में सैकड़ों भक्त रात भर भक्ति सरिता का आनंद लेते हैं. जम्मे में नजदीकी पोकरण शहर के ही भजनगायक भक्तिरस बहा कर सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं. कई श्रद्धालु भी अपनी प्रभु भक्ति से प्रेरित होकर बाबा के भजनों पर नाचते झूमते हैं| रामदेवरा में प्रतिवर्ष 31 दिसंबर को नए वर्ष के आगमन की ख़ुशी में अनोपगढ़ से आये भक्तो द्वारा जम्मा आयोजित किया जाता हैं. आज भी बाबा के भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर बाबा के जम्मे का आयोजन करवाते हैं एवं जम्मे में उपस्थित सभी भक्तों की तन मन से सेवा करते है


घोड़लियो
घोड़लियो अर्थात घोडा, बाबा की सवारी के लिए पूजा जाता है कहते है बाबा रामदेव ने बचपन में अपनी माँ मैणादे से घोडा मंगवाने की जिद कर ली थी. बहुत समझाने पर भी बालक रामदेव के न मानने पर आखिर थक हारकर माता ने उनके लिए एक दरजी ( रूपा दरजी) को एक कपडे का घोडा बनाने का आदेश दिया तथा साथ ही साथ उस दरजी को कीमती वस्त्र भी उस घोड़े को बनाने हेतु दिए.घर जाकर दरजी के मन में पाप आ गया और उसने उन कीमती वस्त्रों की बजाय कपडे के पूर( चिथड़े) उस घोड़े को बनाने में प्रयुक्त किये ओर घोडा बना कर माता मैणादे को दे दिया माता मैणादे ने बालक रामदेव को कपडे का घोड़ा देते हुए उससे खेलने को कहा परन्तु अवतारी पुरुष रामदेव को दरजी की धोखाधड़ी ज्ञात थी. अतः उन्होंने दरजी को सबक सिखाने का निर्णय किया ओर उस घोड़े को आकाश में उड़ाने लगे यह देखकर माता मैणादे मन ही मन में घबराने लगी उन्होंने तुरंत उस दरजी को पकड़ कर लाने को कहा दरजी को लाकर उससे उस घोड़े के बारे में पूछा तो उसने माता मैणादे व बालक रामदेव से माफ़ी मांगते हुए कहा कि उसने ही घोड़े में धोखाधड़ी की है ओर आगे से ऐसा न करने का वचन दिया. यह सुनकर रामदेव जी वापिस धरती पर उतर आये व उस दरजी को क्षमा करते हुए भविष्य में ऐसा न करने को कहा इसी धारणा के कारण ही आज भी बाबा के भक्तजन पुत्ररत्न की प्राप्ति हेतु बाबा को कपडे का घोडा बड़ी श्रद्धा से चढाते है |


पैदल चलने की होड़

रामदेवरा (रूणीचा) में प्रतिवर्ष भादवा माह में एक माह तक चलने वाला मेला आयोजित होता है. इस मेले में लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते है. ये श्रद्धालु अपने-अपने घरों से बाबा के दरबार तक का सफ़र पैदल तय करते है .कोई पुत्ररत्न की चाह में तो कोई रोग कष्ट निवारण हेतु,कोई घर की सुख-शान्ति हेतु यह मान्यता लेकर की बाबा के दरबार में पैदल जाने वाले भक्त को बाबा कभी खाली हाथ नहीं भेजते यहा पर आते है . पैदल श्रद्धालु अमुमन एक संघ के साथ ही यात्रा करते है और इस संघ के साथ अन्य श्रद्धालु भी मार्ग में जुड़ते जाते है. सभी पैदल यात्री बाबा के जयकारे लगाते, नाचते गाते हुए यात्रा करते है.
 रामदेव जी का परचा :-


माता मैणादे को परचा:- 
भादवे की दूज को रामदेवजी ने जब अवतार लिया तब अजमल जी रानी मेंणावती को यह समाचार सुनाने हेतु गये । रानी ने आकर देखा तो पालने में दो बालक, एक तो वीरमदेव जिन्होंने माता मैणादे की गर्भ से जन्म लिया था और एक रामदेव सो रहे थे । यह देखमाता मैणादे मन ही मन चिंता में पड़ गयी । वे इसे प्रभु की लीला को न समझ कर कोई जादू-टोना समझने लगी । उसी समय बालक रामदेव ने रसोईघर में उफन रहे दूध को शांत करवा कर माता मैणादे को अपनी लीला दिखाई और माता का संशय समाप्त हो गया,उन्होंने ख़ुशी से रामदेव को अपनी गोद में ले लिया । 

 दर्जी को परचा:-
बाबा रामदेव ने बचपन में अपनी माँ मैणादे से घोडा मंगवाने की जिद कर ली थी । बहुत समझाने पर भी बालक रामदेव के न मानने पर आखिर थक हारकर माता ने उनके लिए एक दर्जी (रूपा दर्जी) को एक कपडे का घोडा बनाने का आदेश दिया तथा साथ ही साथ उस दर्जीको कीमती वस्त्र भी उस घोड़े को बनाने हेतु दिए ।घर जाकर दर्जी के मन में पाप आ गया और उसने उन कीमती वस्त्रों की बजाय कपडे के पूर (चिथड़े) उस घोड़े को बनाने में प्रयुक्त किये और घोडा बना कर माता मैणादे को दे दिया । माता मैणादे ने बालक रामदेव को कपडे का घोडा देते हुए उससे खेलने को कहा, परन्तु अवतारी पुरुष रामदेव को दर्जी की धोखधडी ज्ञात थी । अतःउन्होने दर्जी को सबक सिखाने का निर्णय किया ओर उस घोडे को आकाश मे उड़ाने लगे । यह देख माता मैणादे मन ही मन में घबराने लगी उन्होंने तुरंत उस दर्जी को पकड़कर लाने को कहा । दर्जी को लाकर उससे उस घोड़े के बारे में पूछा तो उसने माता मैणादे व बालक रामदेव से माफ़ी माँगते हुए कहा की उसने ही घोड़े में धोखधड़ी की हैं और आगे से ऐसा न करने का वचन दिया । यह सुनकर रामदेव जी वापस धरती पर उतर आये व उस दर्जी को क्षमा करते हुए भविष्य में ऐसा न करने को कहा ।

 मिश्री को नमक बनाया:-
एक समय की बात है नगर में एक लाखु नामक "बणजारा" जाति का व्यापारी अपनी बैलगाड़ी पर मिश्री बेचने हेतु आया । उसने अपने व्यापार से सम्बंधित तत्कालीन चुंगी कर नहीं चुकाया था । रामदेवजी ने जब उस बणजारे से चुंगी कर न चुकाने का कारण पूछातो उसने बात को यह कह कर टाल दिया कि यह तो नमक है, और नमक पर कोई चुंगी कर नहीं लगता और अपना व्यापार करने लगा यह देख कर रामदेव जी ने उस बणजारे को सबक सिखाने हेतु उसकी सारी मिश्री नमक में बदल दी।

थोड़ी देर बाद जब सभी लोग उसको मिश्री के नाम पर नमक देने के कारण पीट रहे थे तब उसने रामदेवजी को याद करते हुए माफ़ी मांगी और चुंगी कर चुकाने का वचन दिया । रामदेवजी शीघ्र ही वहां पहुंचे और सभी लोगो को शांत करवाते हुए कहा कि इसको अपनी गलती का पश्चाताप है, अतः इसे मैं माफ़ करता हूँ, और फिर से वह सारा नमक मिश्री में बदल गया ।



भाभी को परचा
भाई वीरमदेव की धर्म पत्नी अर्थात रामदेवजी की भाभी को एक बछड़ा बहुत ही प्रिय था, लेकिन दुर्भाग्यवश वह बछड़ा किसी रोग से ग्रसित हो कर मर गया ।


रामदेवजी ने जब यह समाचार सुने तब वे अपनी भाभी को सांत्वना देने पहुंचे । भाभी ने रामदेव जी के आते ही उनसे उस मरे हुए बछड़े को जीवित करने के लिए प्रार्थना करने लगी, और कहने लगी कि आप तो सिद्ध पुरुष हो आप मेरे बछड़े को कृपया पुनः जीवित कर दे और अश्रुधारा बहाने लगी ।


रामदेवजी को अपनी भाभी का यह दुःख देखा नहीं गया और उन्होंने पलक झपकते ही उस बछड़े को पुनः जीवित कर दिया । यह देखकर भाभी अति हर्षित हुई और रामदेवजी को धन्यवाद अर्पित करने लगी ।


जाते जाते यह भजन सुनता जोवो  सा .......

Saturday, 23 July 2011

तुलसी माला की महिमा

तुलसी
एक सत्य घटना

राजस्थान में जयपुर के पास एक इलाका है – लदाणा। पहले वह एक छोटी सी रियासत थी। उसका राजा एक बार शाम के समय बैठा हुआ था। उसका एक मुसलमान नौकर किसी काम से वहाँ आया। राजा की दृष्टि अचानक उसके गले में पड़ी तुलसी की माला पर गयी। राजा ने चकित होकर पूछाः

"क्या बात है, क्या तू हिन्दू बन गया है ?"

"नहीं, हिन्दू नहीं बना हूँ।"

"तो फिर तुलसी की माला क्यों डाल रखी है ?"

"राजासाहब ! तुलसी की माला की बड़ी महिमा है।"

"क्या महिमा है ?"

"राजासाहब ! मैं आपको एक सत्य घटना सुनाता हूँ। एक बार मैं अपने ननिहाल जा रहा था। सूरज ढलने को था। इतने में मुझे दो छाया-पुरुष दिखाई दिये, जिनको हिन्दू लोग यमदूत बोलते हैं। उनकी डरावनी आकृति देखकर मैं घबरा गया। तब उन्होंने कहाः

"तेरी मौत नहीं है। अभी एक युवक किसान बैलगाड़ी भगाता-भगाता आयेगा। यह जो गड्ढा है उसमें उसकी बैलगाड़ी का पहिया फँसेगा और बैलों के कंधे पर रखा जुआ टूट जायेगा। बैलों को प्रेरित करके हम उद्दण्ड बनायेंगे, तब उनमें से जो दायीं ओर का बैल होगा, वह विशेष उद्दण्ड होकर युवक किसान के पेट में अपना सींग घुसा देगा और इसी निमित्त से उसकी मृत्यु हो जायेगी। हम उसी का जीवात्मा लेने आये हैं।"

राजासाहब ! खुदा की कसम, मैंने उन यमदूतों से हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि 'यह घटना देखने की मुझे इजाजत मिल जाय।' उन्होंने इजाजत दे दी और मैं दूर एक पेड़ के पीछे खड़ा हो गया। थोड़ी ही देर में उस कच्चे रास्ते से बैलगाड़ी दौड़ती हुई आयी और जैसा उन्होंने कहा था ठीक वैसे ही बैलगाड़ी को झटका लगा, बैल उत्तेजित हुए, युवक किसान उन पर नियंत्रण पाने में असफल रहा। बैल धक्का मारते-मारते उसे दूर ले गये और बुरी तरह से उसके पेट में सींग घुसेड़ दिया और वह मर गया।"

राजाः "फिर क्या हुआ ?"

नौकरः "हजूर ! लड़के की मौत के बाद मैं पेड़ की ओट से बाहर आया और दूतों से पूछाः 'इसकी रूह (जीवात्मा) कहाँ है, कैसी है ?"

वे बोलेः 'वह जीव हमारे हाथ नहीं आया। मृत्यु तो जिस निमित्त से थी, हुई किंतु वहाँ हुई जहाँ तुलसी का पौधा था। जहाँ तुलसी होती है वहाँ मृत्यु होने पर जीव भगवान श्रीहरि के धाम में जाता है। पार्षद आकर उसे ले जाते हैं।'

हुजूर ! तबसे मुझे ऐसा हुआ कि मरने के बाद मैं बिहिश्त में जाऊँगा कि दोजख में यह मुझे पता नहीं, इसले तुलसी की माला तो पहन लूँ ताकि कम से कम आपके भगवान नारायण के धाम में जाने का तो मौका मिल ही जायेगा और तभी से मैं तुलसी की माला पहनने लगा।'

कैसी दिव्य महिमा है तुलसी-माला धारण करने की ! इसीलिए हिन्दुओं में किसी का अंत समय उपस्थित होने पर उसके मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डाला जाता है, ताकि जीव की सदगति हो जाय।

Friday, 22 July 2011

नफ़रत मत करना मां

उठ मां,
मुझ से दो बातें करले
नो माह के सफर को
तीन माह में विराम
देने का निर्णय कर
तू चैन की नींद सोई है,
सच मान तेरे इस निर्णय से
तेरी यह बिटिया बहुत रोई है,
नन्ही सी अपनी अजन्मी बिटिया के
टुकड़े टुकड़े करवा
अपनी कोख उजाड़ दोगी!
सुन मां,
बस इतना कर देना
उन टुकडों को जोड़ कर
इक कफ़न दे देना,
ज़िन्दगी ना पा सकी
तेरे आँगन की चिड़िया
मौत तो अच्छी दे देना,
साँसे ना दे सकी ऐ मां,मुझे तू
मृत रूप में
अपने अंश को देख तो लेना
आख़िर
तेरा खून,तेरी सांसों की सरगम हूँ,
ऐ मां,मुझसे इतनी नफरत ना करना

Tuesday, 19 July 2011

गणगोर का मेला

गणगोर का मेला:- 





गणगोर   माता 
गणगोर का मेला निम्बी जोधन मे बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है , होली के दुसरे दिन से गाव की लड़कीया गणगोर माता की १५ दिन तक पूजा करती है बाद मे मेला लगता है और गोर और ईशर की सवारी निकलती है और बैंड बाजे के साथ महिलाये धूम धाम से गढ़ से निकल कर गीत गाती मुख्य मार्गो से हो कर बस स्टैंड स्तिथ हुनमान जी के मंदिर मे आती है गावं में बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमे सभी प्रकार की दुकाने लगती
है


गणगोर का गीत:-
पुजन्देयो गणगोर भवर सा

Saturday, 16 July 2011

सावण री राम राम

बिजली सी चिमकै चेतन में याद कर्यां बै बांता।
पलकां झपक्या करती कोनी, घुली धुली सी'र रातां।।
मन नादीदो नैण तिसाया, कान तरसता नेह।
चातक कोई तकै उड़िकै, बिन मौसम को मेह।।
सांस सांम में भरी गुदगुदी, हो री मन में खाटी।
रै सावण ले आव सजन नै, वाह भई शेखावाटी।।