Friday, 13 July 2012

राजस्थानी लड़का

खिला एक फूल फिर इन रेगिस्थानो में.
मुरझाने फिर चला दिल्ली की गलियों में.
स्नातक की डिग्री हाथ में थामे निकल गया.
फिर एक राजस्थानी लड़का जिंदा लांश बन गया.......

... खो गया इस भागती भीड़ में वो.
रोज़ मारा बस के धक्कों में वो.
दिन है या रात वो भूल गया.
फिर एक राजस्थानी लड़का जिंदा लांश बन गया......

देर से रात घर आता है पर कोई टोकता नहीं.
भूख लगती है उसे पर माँ अब आवाज लगाती नहीं.
कितने दिन केवल चाय पीकर वो सोता गया.
फिर एक राजस्थानी लड़का जिंदा लांश बन गया......

अब साल में चार दिन घर जाता है वो.
सारी खुशियाँ घर से समेट लाता है वो.
अपने घर में अब वो मेहमान बन गया
फिर एक राजस्थानी लड़का जिंदा लांश बन गया......

मिलजाए कोई गाँव का तो हँसे लेता है वो.
पूरी अनजानी भीड़ में उसे अपना लगता है वो.
राजस्थानी गाने सुने तो उदास होता गया..
फिर एक राजस्थानी लड़का जिंदा लांश बन गया......

न जाने कितने फूल रेगिस्थान के यूँ ही मुरझाते हैं..
नौकरी के बाज़ार में वो बिक जाते है.
रोते हैं माली रोता है चमन..
राजस्थान का फूल राजस्थान में महकेगा की नहीं...............?



प्रस्तुती:- रंगीलो राजस्थान 

2 comments:

Rajput said...

जब पहले पहले में घर से बाहर निकला तो गाँव की बहुत याद आती थी. शहर में दिल नहीं लगता था . लेकिन अब उल्टा हो गया :) पिछले बीस सालों से गाँव से बाहर रह रहा हूँ तो अब आदत पड़ गई . वैसे तो सारा हिंदुस्तान हमारा है फिर क्या राजस्थान और क्या कर्नाटका.
एन्जॉय द लाइफ Anywhere Anytime

NARESH SINGH RATHORE said...

भाव पूर्ण प्र्स्तुति है ।

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